सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश की याचिका ठुकराई, कहा—ऐसा कानून रोजगार को प्रभावित कर सकता है
By : hashtagu, Last Updated : March 13, 2026 | 6:18 pm
By : hashtagu, Last Updated : March 13, 2026 | 6:18 pm
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को देशभर में मासिक धर्म (menstrual) अवकाश की नीति लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने यह निर्णय देते हुए कहा कि अगर इस तरह का अवकाश अनिवार्य बनाया गया तो संभावित रूप से महिलाओं की नौकरी मिलने की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और नियोक्ता उन्हें काम पर रखना टाल सकते हैं, जिससे रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कानून अनजाने में लिंग आधारित रूढ़ियों को बढ़ावा दे सकता है और “महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम योग्य” के रूप में पेश कर सकता है। न्यायालय ने यह पाया कि इस प्रकार की नीति बनाने का निर्णय सरकार और नीति निर्धारकों के पक्ष में है और सीधी न्यायिक हस्तक्षेप का विषय नहीं होना चाहिए।
हालांकि न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि सम्बंधित प्राधिकारी याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व देखें और सभी हितधारकों से विचार-विमर्श कर संभावित नीति पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसे अनिवार्य रूप से लागू करने की मांग स्वीकार नहीं की गई।
न्यायालय के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि मासिक धर्म अवकाश के मुद्दे को व्यापक नीति स्तर पर विचार करने की जरूरत है, न कि सीधे अदालती आदेश से लागू करने की।