वट सावित्री व्रत 2026: जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और सावित्री-सत्यवान की पवित्र कथा

By : hashtagu, Last Updated : May 14, 2026 | 10:45 pm

नई दिल्ली: वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है, जिसमें पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को किया जाता है और कुछ राज्यों में इसे पूर्णिमा के दिन भी मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत उत्तर भारत में 27 मई और कुछ परंपराओं के अनुसार 2 जून को मनाया जाएगा। वहीं महाराष्ट्र और गुजरात में यह व्रत 11 जून 2026 के आसपास मनाया जा सकता है।

इस दिन महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ या पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं और वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं। पूजा में वृक्ष की जड़ में जल अर्पित किया जाता है और कच्चे सूत या रक्षा सूत्र से पेड़ को बांधा जाता है। इसके बाद सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा की जाती है। व्रतधारी महिलाएं फूल, फल, सिंदूर, चूड़ियां और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं। इसके साथ ही वट सावित्री व्रत की कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार यह कथा महाभारत के वन पर्व से जुड़ी है, जिसमें सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आती हैं। उनकी अटूट भक्ति, बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प के कारण उन्हें यह वरदान मिलता है। यही कारण है कि यह व्रत स्त्रियों के सौभाग्य, समर्पण और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

वट वृक्ष को इस व्रत में विशेष महत्व दिया गया है क्योंकि इसे दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और अपने परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करती हैं। कई स्थानों पर इसे सामूहिक रूप से भी मनाया जाता है, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं एक साथ पूजा करती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं।

धार्मिक जानकारों के अनुसार इस व्रत का पालन पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ करना चाहिए। सही मुहूर्त और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा करने से इसका विशेष फल प्राप्त होता है। यह व्रत भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, आस्था और पारिवारिक समर्पण का प्रतीक माना जाता है।