दंतेवाड़ा में इतिहास का बड़ा खजाना मिला: सदियों पुराने 5 शिलालेख और 2 दुर्लभ पांडुलिपियां बरामद, तेलुगु-उड़िया भाषा के मिले प्रमाण

By : hashtagu, Last Updated : May 30, 2026 | 5:54 pm

दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले से इतिहास (History), संस्कृति (Culture) और प्राचीन ज्ञान परंपरा (Ancient Knowledge Tradition) से जुड़ी बड़ी खोज सामने आई है। भारत सरकार के ज्ञान भारतम मिशन (Gyan Bharatam Mission) के तहत जिले में सदियों पुराने 5 प्राचीन शिलालेख (Ancient Inscriptions) और 2 दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियां (Rare Manuscripts) खोजी गई हैं। इन खोजों को भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक दस्तावेजों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार दंतेवाड़ा के समलूर स्थित शिव मंदिर में 11वीं शताब्दी का एक प्राचीन शिलालेख मिला है, जो तेलुगु भाषा में लिखा गया है। इसके साथ ही 18वीं से 20वीं शताब्दी के बीच कपड़े पर लिखी गई एक दुर्लभ पांडुलिपि भी मिली है, जिसने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

ऐतिहासिक नगरी बारसूर के प्रसिद्ध मामा-भांजा मंदिर परिसर से भी 1060 से 1068 ईस्वी के बीच का एक महत्वपूर्ण शिलालेख मिला है। इस शिलालेख पर भी तेलुगु भाषा अंकित है। वहीं विश्व प्रसिद्ध मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में 13वीं शताब्दी के दो महत्वपूर्ण शिलालेख मिले हैं, जिनमें तेलुगु और देवनागरी लिपि का उपयोग किया गया है।

इतना ही नहीं, जिले के आवराभांटा गांव में रहने वाले इंद्रजीत यादव के घर से लगभग 200 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपि बरामद हुई है। यह पांडुलिपि उड़िया भाषा में लिखी गई है और इसे दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पांडुलिपियां उस दौर की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती हैं।

दंतेवाड़ा प्रशासन का मानना है कि जिले में अभी भी कई ऐतिहासिक धरोहरें छिपी हो सकती हैं। आने वाले समय में सर्वे के दौरान और भी महत्वपूर्ण शिलालेख, पांडुलिपियां और पुरातात्विक अवशेष मिलने की संभावना है। इन खोजों से क्षेत्र के इतिहास को नए सिरे से समझने में मदद मिलेगी।

दंतेवाड़ा के एसडीएम लोकांश एलमा ने बताया कि संस्कृति मंत्रालय के ज्ञान भारतम मिशन के तहत जिले में व्यापक सर्वे कराया जा रहा है। मिशन का उद्देश्य पुरानी और छिपी हुई ऐतिहासिक धरोहरों की पहचान कर उन्हें डिजिटल सर्वे और जियो-टैगिंग के माध्यम से सुरक्षित करना है। उन्होंने जिलेवासियों से अपील की है कि यदि किसी के पास इस तरह की ऐतिहासिक सामग्री या धरोहर मौजूद हो तो उसकी जानकारी प्रशासन को दें, ताकि उसे भी सर्वे सूची में शामिल कर संरक्षित किया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में इस प्रकार की खोजें न केवल इतिहास को संरक्षित करने में मदद करेंगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का भी काम करेंगी।