एमके स्टालिन की चौंकाने वाली हार: कौन हैं VS बाबू जिन्होंने CM को हराया और DMK का किला ढहाया

यह मुकाबला किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा, जहां एक नाराज (disgruntled) पूर्व सहयोगी ने अपने ही पूर्व बॉस के खिलाफ जीत दर्ज कर “मीठा बदला” (sweet revenge) ले लिया।

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  • Publish Date - May 4, 2026 / 07:27 PM IST

नई दिल्ली/चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर (major upset) तब देखने को मिला जब मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को उनके मजबूत गढ़ कोलाथुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा। अभिनेता विजय की पार्टी TVK के उम्मीदवार वीएस बाबू ने स्टालिन को 9,192 वोटों से हराकर राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया।

यह मुकाबला किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा, जहां एक नाराज (disgruntled) पूर्व सहयोगी ने अपने ही पूर्व बॉस के खिलाफ जीत दर्ज कर “मीठा बदला” (sweet revenge) ले लिया। वीएस बाबू कभी स्टालिन के करीबी माने जाते थे और उन्होंने पहले उनके चुनाव अभियान (campaign) में अहम भूमिका निभाई थी।

कोलाथुर सीट का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। यह सीट 2011 के चुनाव से पहले परिसीमन (delimitation) के बाद बनाई गई थी। उसी साल स्टालिन, जो उस समय उपमुख्यमंत्री थे, ने AIADMK के सैदाई दुरईसामी को 2,734 वोटों से हराया था।

इसके बाद 2016 और 2021 के चुनावों में स्टालिन ने इस सीट पर बड़ी जीत दर्ज की। 2016 में उन्होंने AIADMK के जेसीडी प्रभाकर को 37,730 वोटों से हराया, जबकि 2021 में आदी राजाराम को 70,384 वोटों के बड़े अंतर से हराकर यह सीट पूरी तरह DMK का गढ़ बन गई थी।

लेकिन 2026 में यह पूरी कहानी बदल गई। कोलाथुर, जिसे स्टालिन का सबसे सुरक्षित (stronghold) क्षेत्र माना जाता था, वहीं से उन्हें करारी हार मिली।

अगर इतिहास पर नजर डालें तो 2011 में DMK नेतृत्व ने स्टालिन को थाउजेंड लाइट्स सीट से हटाकर नई कोलाथुर सीट पर उतारा था। थाउजेंड लाइट्स सीट पर वह पहले 6 में से 4 चुनाव जीत चुके थे। हालांकि कोलाथुर में उनका पहला चुनाव उम्मीद से ज्यादा कड़ा रहा था और उसी समय वीएस बाबू, जो उनके अभियान को संभाल रहे थे, पर सवाल उठे थे।

अब वही बाबू, जो कभी स्टालिन की चुनावी रणनीति (strategy) का हिस्सा थे, आज उनके सबसे बड़े राजनीतिक चुनौती बनकर सामने आए और उन्हें हरा दिया।

इस हार को DMK के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि यह सिर्फ एक सीट की हार नहीं बल्कि पार्टी के सबसे बड़े चेहरे और मजबूत गढ़ के टूटने का संकेत है।