छत्तीसगढ़ से 400 बच्चे अब भी लापता, लड़कियां सबसे ज्यादा: देशभर में 33,577 चाइल्ड मिसिंग केस, पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर
By : hashtagu, Last Updated : March 8, 2026 | 4:13 pm
By : hashtagu, Last Updated : March 8, 2026 | 4:13 pm
रायपुर (छत्तीसगढ़): देशभर में बच्चों के लापता (Missing) होने के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (Ministry of Women and Child Development) की ‘मिसिंग चिल्ड्रन रिपोर्ट’ (Missing Children Report) में सामने आया है कि छत्तीसगढ़ के 400 बच्चे अब भी लापता हैं और उनका पता अब तक पुलिस नहीं लगा पाई है। रिपोर्ट के मुताबिक इन मामलों में सबसे ज्यादा संख्या लड़कियों (girls) की है।
रिपोर्ट के अनुसार 1 जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच पूरे देश में कुल 33 हजार 577 बच्चे लापता हुए। इनमें से 7 हजार 777 बच्चों का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है, जबकि बाकी बच्चों को पुलिस और प्रशासन ने तलाश कर लिया है और उन्हें उनके परिवार तक पहुंचाया गया है।
इसी अवधि में छत्तीसगढ़ से 982 बच्चे लापता हुए थे। इनमें से 582 बच्चों को पुलिस ने बरामद कर लिया है, लेकिन 400 बच्चे अब भी लापता हैं। आंकड़ों के अनुसार बच्चों के गायब होने के मामलों में छत्तीसगढ़ देश में छठे स्थान पर है। प्रदेश में सबसे ज्यादा 14 से 17 साल उम्र के किशोर-किशोरियों के लापता होने के मामले सामने आए हैं और इनमें लड़कियों की संख्या अधिक है।
रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों के लापता होने के मामलों में पश्चिम बंगाल देश में पहले स्थान पर है। यहां इस अवधि में 19 हजार 145 बच्चे लापता हुए। इनमें से 15 हजार 465 बच्चों को खोज लिया गया, जबकि 3 हजार 680 बच्चे अब भी नहीं मिल पाए हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है, जहां 4 हजार 256 बच्चे लापता हुए। इनमें से 1 हजार 59 बच्चों का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।
वहीं रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस अवधि के दौरान बच्चों के लापता होने की कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई। इनमें नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गुजरात, लक्षद्वीप और दादर नगर हवेली शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के लापता होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें घर से भाग जाना, मानव तस्करी, काम के लिए बाहर ले जाना या अन्य आपराधिक गतिविधियां शामिल हैं। ऐसे मामलों को रोकने के लिए परिवारों, स्कूलों और समाज को भी सतर्क रहने की जरूरत है, ताकि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।