रायपुर कोर्ट ने ACB-EOW चीफ अमरेश मिश्रा समेत 3 अफसरों के खिलाफ शिकायत खारिज की

By : hashtagu, Last Updated : February 18, 2026 | 7:51 pm

रायपुर, 18 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ के चर्चित कोल स्कैम (coal scam) मामले में ‘टाइप्ड बयान’ को लेकर दायर याचिका को रायपुर की अदालत ने शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह फैसला आरोप सही या गलत होने पर नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) के आधार पर दिया गया है।

शिकायत छत्तीसगढ़ ACB-EOW के चीफ Amresh Mishra, एडिशनल एसपी चंद्रेश ठाकुर और डीएसपी राहुल शर्मा के खिलाफ दायर की गई थी। रायपुर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आकांक्षा बेक की अदालत ने अपने आदेश में कहा कि कानून के अनुसार जिस अदालत में बयान या दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हों, उसी अदालत को उस पर सुनवाई का अधिकार होता है। मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज बयान से जुड़ा है, लेकिन इस अदालत के पास इसकी सुनवाई का अधिकार नहीं है। इसी आधार पर शिकायत खारिज की जाती है।

यह मामला छत्तीसगढ़ कोल घोटाले (केस नंबर 02/2024 और 03/2024) से जुड़ा है। आरोप है कि EOW ने मजिस्ट्रेट के समक्ष आरोपी निखिल चंद्राकर का बयान दर्ज कराने के बजाय पहले से तैयार किया गया टाइप्ड बयान अदालत में पेश कर दिया।

मामले की स्वीकार्यता को लेकर अदालत में दोनों पक्षों के बीच जोरदार बहस हुई। राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता रवि शर्मा ने दलील दी कि मामला इस अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उन्होंने कहा कि जिन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की गई है, वे अपने सरकारी कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे और उन्हें कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।

वहीं शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Faizal Rizvi ने तर्क दिया कि यदि कोई अपराध हुआ है तो उसकी सूचना देना हर नागरिक का अधिकार है। यह मामला अदालत के खिलाफ नहीं बल्कि कथित आपराधिक कृत्य से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि इस आदेश के खिलाफ रिविजन याचिका दायर की जाएगी।

पूरे घटनाक्रम के अनुसार, कोल घोटाले में आरोपी सूर्यकांत तिवारी की जमानत सुनवाई के दौरान EOW/ACB ने कुछ दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए थे। इनमें सह-आरोपी निखिल चंद्राकर का बयान भी शामिल था, जिसे धारा 164 के तहत दर्ज बताया गया। शिकायतकर्ता गिरीश देवांगन का आरोप है कि जब बयान की प्रति बचाव पक्ष को दी गई तो उसमें कई गड़बड़ियां सामने आईं।

शिकायत में कहा गया कि बयान की भाषा और फॉन्ट अदालत में प्रचलित प्रारूप से मेल नहीं खाते। आरोप है कि बयान अदालत में दर्ज करने के बजाय बाहर किसी कंप्यूटर पर तैयार किया गया और पेनड्राइव के जरिए अदालत में जमा किया गया। मजिस्ट्रेट के सामने विधिवत बयान दर्ज नहीं कराया गया।

गिरीश देवांगन के अनुसार, यह दस्तावेजों की कूटरचना का मामला है और इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए। उन्होंने 12 सितंबर 2025 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (सतर्कता) के समक्ष आवेदन देकर दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराई। रिपोर्ट में कथित तौर पर यह सामने आया कि बयान अदालत के निर्धारित फॉर्मेट से मेल नहीं खाता। इसके बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रायपुर के समक्ष आपराधिक शिकायत दायर की गई।

वरिष्ठ अधिवक्ता फैजल रिजवी का कहना है कि यदि जांच एजेंसी ने कार्यालय से तैयार टाइप किया हुआ बयान अदालत में पेश किया है तो यह न्यायालयीन प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर भी सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि आगे इस मामले को उच्च अदालत में चुनौती दी जाएगी।

फिलहाल रायपुर की अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिकायत को अधिकार क्षेत्र के अभाव में खारिज किया गया है, न कि आरोपों की सत्यता पर कोई टिप्पणी की गई है।