पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन: पंडवानी की बुलंद आवाज हुई खामोश, 13 साल की उम्र से रचा था इतिहास

डॉ. तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवाती बाई था।

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  • Updated On - July 5, 2026 / 02:20 PM IST

रायपुर, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई (Teejan Bai) का रायपुर के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वह लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। निधन के समय उनकी आयु 70 वर्ष, 2 महीने और 11 दिन थी। उनके निधन से लोककला (Folk Art), पंडवानी (Pandavani) और भारतीय सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) जगत को बड़ी क्षति हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

डॉ. तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा और माता का नाम सुखवाती बाई था। वह छत्तीसगढ़ की पारधी अनुसूचित जनजाति से संबंध रखती थीं। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कहानियों में गहरी रुचि थी। उनके नाना ब्रजलाल पारधी छत्तीसगढ़ी और हिंदी में महाभारत की कथाएं गाकर सुनाते थे। इन्हीं कथाओं को सुनते-सुनते उन्होंने पंडवानी की कला सीखी और बाद में उमेद सिंह देशमुख से इसका अनौपचारिक प्रशिक्षण लिया।

डॉ. तीजन बाई ने मात्र 13 साल की उम्र में अपना पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन किया था। उस समय पंडवानी गायन में महिलाएं केवल बैठकर प्रस्तुति देती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता था। लेकिन उन्होंने परंपरा को बदलते हुए पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को अपनाया और खड़े होकर अपने दमदार स्वर, अभिनय और प्रभावशाली प्रस्तुति से पंडवानी को नई पहचान दिलाई। उनकी अनोखी शैली ने उन्हें देश ही नहीं, दुनिया भर में लोककला की पहचान बना दिया।

डॉ. तीजन बाई ने अपने लंबे कला जीवन में पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उनकी आवाज, अभिनय और महाभारत की जीवंत प्रस्तुति ने उन्हें भारतीय लोककला की सबसे बड़ी हस्तियों में शामिल कर दिया। उनके निधन से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में शोक की लहर है और कला जगत ने एक अमूल्य धरोहर खो दी है।