एमपी में बाघ की मौत पर बड़ा सवाल: 23 दिन गायब रहा सिग्नल, ‘ग्ल्फ वॉर’ बहाना या सिस्टम की नाकामी?

इस बीच, रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा द्वारा भेजे गए एक मेमो में सिग्नल गायब होने की वजह “गल्फ वॉर से जुड़े संभावित सैटेलाइट ग्लिच” बताई गई।

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  • Publish Date - April 6, 2026 / 10:06 PM IST

भोपाल: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व (Satpura Tiger Reserve) में एक बाघ की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रेडियो कॉलर (radio collar) लगे इस बाघ का सिग्नल 3 मार्च से गायब था, लेकिन 23 दिनों तक कोई जमीनी जांच नहीं की गई। बाद में जब टीम मौके पर पहुंची तो बाघ का शव दफन मिला, जिससे पूरे मामले में लापरवाही उजागर हो गई।

इस बीच, रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा द्वारा भेजे गए एक मेमो में सिग्नल गायब होने की वजह “गल्फ वॉर से जुड़े संभावित सैटेलाइट ग्लिच” बताई गई। यानी अमेरिका-ईरान तनाव का असर सैटेलाइट सिस्टम पर पड़ा हो सकता है। हालांकि, जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा गंभीर निकली।

जानकारी के मुताबिक करीब चार साल के इस बाघ की गर्दन में लगभग 6 लाख रुपये का सैटेलाइट कॉलर लगा था। प्रोटोकॉल के अनुसार अगर 8 घंटे तक सिग्नल नहीं मिलता है तो तुरंत टीम को मौके पर भेजना जरूरी होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया।

करीब 23 दिन बाद 27-28 मार्च को जब वन विभाग की टीम छिंदवाड़ा के संगाखेड़ा रेंज के छतियाम गांव पहुंची, तो एक खौफनाक सच्चाई सामने आई। शिकारियों ने पहले एक बैल को मारकर उसे चारे के रूप में इस्तेमाल किया और पहचान छिपाने के लिए उसके कान काट दिए। बाघ जैसे ही उस मांस के पास पहुंचा, उसे मार दिया गया।

इसके बाद आरोपियों ने सबूत मिटाने की कोशिश में बाघ के गले में लगे कॉलर को जला दिया और शव को करीब 200 मीटर दूर गड्ढे में दफना दिया। बाद में डॉग स्क्वॉड की मदद से करीब 24 दिन पुराना शव बरामद किया गया।

इस मामले में अब तक जमीन के मालिक उदेसिंह सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समय पर कार्रवाई होती तो इस बाघ को बचाया जा सकता था?

अब वन विभाग की देरी, निगरानी सिस्टम की विफलता और “अंतरराष्ट्रीय कारणों” के हवाले से दिए गए तर्कों पर बहस तेज हो गई है।