TMC में बढ़ा सियासी घमासान: अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को लिखा पत्र, बागी गुट को मान्यता न देने की मांग

अभिषेक बनर्जी का यह कदम ऐसे समय आया है जब टीएमसी के बागी सांसदों का एक समूह लोकसभा में अलग पहचान और मान्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

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  • Publish Date - June 14, 2026 / 07:49 PM IST

नई दिल्ली/कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी अंदरूनी कलह के बीच पार्टी सांसद और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर बागी सांसदों के किसी भी अलग गुट को संसद में मान्यता नहीं देने की मांग की है। अभिषेक बनर्जी ने स्पष्ट कहा है कि टीएमसी एक ही राजनीतिक दल है और पार्टी के भीतर किसी भी अलग संसदीय समूह को आधिकारिक पहचान नहीं दी जानी चाहिए।

अभिषेक बनर्जी का यह कदम ऐसे समय आया है जब टीएमसी के बागी सांसदों का एक समूह लोकसभा में अलग पहचान और मान्यता हासिल करने की कोशिश कर रहा है। बागी सांसद दावा कर रहे हैं कि उनके पास पार्टी के बड़ी संख्या में सांसदों का समर्थन है और वे खुद को “वास्तविक टीएमसी” के रूप में पेश करना चाहते हैं।

पत्र में अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि किसी भी ऐसे दावे या आवेदन को स्वीकार न किया जाए, जो टीएमसी के भीतर अलग संसदीय गुट बनाने से संबंधित हो। उन्होंने कहा कि पार्टी की आधिकारिक पहचान और प्रतिनिधित्व केवल तृणमूल कांग्रेस के पास है और किसी भी अलग गुट को मान्यता देना संसदीय परंपराओं के विपरीत होगा।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल के दिनों में कई सांसदों और नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी जताई है। बागी खेमे का दावा है कि उनके साथ बड़ी संख्या में सांसद जुड़े हुए हैं और वे संसद में अलग समूह के तौर पर मान्यता पाने की तैयारी कर रहे हैं।

इस बीच मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख Mamata Banerjee ने भी संगठन में बड़े बदलाव किए हैं। पार्टी ने कई पदों पर फेरबदल कर बागी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से हटाया है। इसे पार्टी पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष के सामने बागी सांसदों की ओर से अलग पहचान की मांग और टीएमसी नेतृत्व की आपत्तियां बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा बन सकती हैं। वहीं पूर्व लोकसभा महासचिव और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि दल-बदल कानून के तहत अलग संसदीय गुट को मान्यता देने की प्रक्रिया आसान नहीं है और इसमें कानूनी बाधाएं भी मौजूद हैं।