हिंदू रीति से शादी करने वाले आदिवासी भी हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

यह फैसला जस्टिस संजय के. अग्रवाल (Justice Sanjay K. Agrawal) और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा (Justice Arvind Kumar Verma) की डिवीजन बेंच ने सुनाया।

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  • Updated On - March 6, 2026 / 07:54 PM IST

बिलासपुर, छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) से संबंधित व्यक्ति हिंदू रीति‑रिवाज (Hindu Customs) और परंपराओं के अनुसार विवाह करते हैं, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम 1955 (Hindu Marriage Act 1955) के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।

यह फैसला जस्टिस संजय के. अग्रवाल (Justice Sanjay K. Agrawal) और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा (Justice Arvind Kumar Verma) की डिवीजन बेंच ने सुनाया। मामला एक ऐसे दंपति से जुड़ा था, जिसमें पति अनुसूचित जनजाति समुदाय से था और उसने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर की थी।

फैमिली कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार अनुसूचित जनजाति समुदाय इस कानून के दायरे से बाहर है। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धारा 2(2) का उद्देश्य अनुसूचित जनजाति समुदाय को सुरक्षा देना है, न कि उन्हें पूरी तरह इस कानून से बाहर करना। यदि कोई आदिवासी व्यक्ति स्वेच्छा से हिंदू धर्म की परंपराओं और रीति‑रिवाजों को अपनाता है और उसी के अनुसार विवाह करता है, तो वह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अपने अधिकारों का उपयोग कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब विवाह हिंदू रीति‑रिवाजों जैसे सप्तपदी आदि के अनुसार हुआ हो, तो ऐसे मामलों को केवल जनजातीय परंपरागत अदालतों तक सीमित नहीं किया जा सकता। ऐसे दंपति हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक या अन्य वैवाहिक राहत के लिए अदालत का सहारा ले सकते हैं।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया और कहा कि याचिका पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए।