छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, विवाहित बेटी भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार, बैंक का आदेश रद्द

न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने अफीफा खान उर्फ देवांगी चौधरी की याचिका स्वीकार करते हुए बैंक ऑफ महाराष्ट्र द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन खारिज करने के आदेश को निरस्त कर दिया

  • Written By:
  • Publish Date - July 21, 2026 / 01:50 PM IST

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (High Court)  ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि बेटी (Daughter) शादी (Marriage) के बाद पराई नहीं हो जाती। यदि वह वास्तविक रूप से आश्रित (Dependent) है तो केवल विवाहित होने के आधार पर उसे अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की आर्थिक निर्भरता का आकलन उसकी वैवाहिक स्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने अफीफा खान उर्फ देवांगी चौधरी की याचिका स्वीकार करते हुए बैंक ऑफ महाराष्ट्र द्वारा अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन खारिज करने के आदेश को निरस्त कर दिया। हाई कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट के कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) मामले में दिए गए फैसले के अनुरूप 30 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के आवेदन पर नए सिरे से कारणयुक्त निर्णय ले।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता देवाशीष चौधरी बैंक ऑफ महाराष्ट्र में डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान उनके निधन के बाद उनकी इकलौती बेटी अफीफा खान ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। बैंक ने यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि वह विवाहित हैं और विवाह के बाद पति पर आश्रित मानी जाएंगी, इसलिए उन्हें पिता के परिवार की आश्रित सदस्य नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि बैंक का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन है। यह भी कहा गया कि बैंक की नीति में केवल “आश्रित पुत्री” का उल्लेख है और कहीं भी विवाहित पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपात्र घोषित नहीं किया गया है। वहीं बैंक ने अपने फैसले के समर्थन में वर्ष 2022 के सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का हवाला दिया।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) मामले में कानून की स्थिति स्पष्ट कर दी है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि विवाह के बाद भी बेटी का अपने माता-पिता से संबंध समाप्त नहीं होता। यदि विवाहित पुत्र को आश्रित माना जा सकता है तो केवल विवाह के आधार पर विवाहित पुत्री को बाहर करना लैंगिक भेदभाव होगा। किसी भी व्यक्ति के आश्रित होने का निर्धारण उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल उसके विवाहित होने के आधार पर।

हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने बिना किसी तथ्यात्मक जांच के केवल विवाह के आधार पर यह मान लिया कि याचिकाकर्ता अपने पिता पर आश्रित नहीं थी। अदालत ने बैंक के 27 अक्टूबर 2026 के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नए सिरे से विचार किया जाए और 30 दिनों के भीतर कारणयुक्त फैसला लिया जाए।