छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गायत्री मंत्र विवाद पर याचिका खारिज की, कहा- नैतिक शिक्षा पर संविधान में कोई रोक नहीं

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई है, क्योंकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ कि किसी छात्र को इन प्रार्थनाओं में भाग लेने के लिए बाध्य किया गया है।

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  • Publish Date - July 8, 2026 / 06:40 PM IST

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना (Saraswati Vandana), गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) और अन्य प्रार्थनाओं के पाठ से जुड़े राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि संविधान (Constitution) नैतिक शिक्षा (Moral Instruction) देने पर कोई रोक नहीं लगाता। साथ ही कोर्ट ने माना कि फिलहाल ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि किसी छात्र को इन प्रार्थनाओं में जबरन शामिल होने के लिए मजबूर किया गया हो।

यह मामला 12 जून 2026 को छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी उस परिपत्र से जुड़ा है, जिसमें सरकारी स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र और दिन के अंत में गायत्री मंत्र व शांति मंत्र के पाठ का निर्देश दिया गया था। इस आदेश को अब्दुल सलाम रिजवी, महेंद्र छाबड़ा और शफीक अहमद ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि यह आदेश धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई है, क्योंकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ कि किसी छात्र को इन प्रार्थनाओं में भाग लेने के लिए बाध्य किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश को पढ़ने से कहीं भी यह नहीं लगता कि छात्रों की भागीदारी अनिवार्य की गई है या उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि भविष्य में किसी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध प्रार्थना करने के लिए मजबूर किया जाता है या उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो याचिकाकर्ता दोबारा अदालत का रुख कर सकते हैं। ऐसे मामलों में अदालत उचित कार्रवाई करेगी।

अपने फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि संविधान में नैतिक शिक्षा पर कोई प्रतिबंध नहीं है। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी छात्र को उसकी आस्था या अंतरात्मा की स्वतंत्रता के विरुद्ध धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।