13 साल कोमा में रहने वाले हरीश राणा का निधन, सुप्रीम कोर्ट से मिली थी इच्छामृत्यु की इजाजत

उनके परिवार ने वर्षों तक इलाज कराया, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और बेटे को ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ देने की अनुमति मांगी।

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  • Publish Date - March 24, 2026 / 07:44 PM IST

नई दिल्ली: 13 साल से कोमा (coma) और वेजिटेटिव स्टेट (vegetative state) में रह रहे हरीश राणा का मंगलवार को निधन हो गया। वह भारत के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया (passive euthanasia) यानी जीवन रक्षक उपचार (life support) हटाने की अनुमति दी थी।

करीब 32 वर्षीय हरीश राणा 2013 में एक इमारत से गिरने के बाद गंभीर सिर की चोट का शिकार हो गए थे, जिसके बाद वह कभी होश में नहीं आए और लगातार अस्पताल में मशीनों के सहारे जिंदा रहे।

उनके परिवार ने वर्षों तक इलाज कराया, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और बेटे को ‘गरिमा के साथ मृत्यु’ देने की अनुमति मांगी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए जीवन रक्षक सिस्टम हटाने की इजाजत दी थी।

अदालत के आदेश के बाद हरीश राणा को दिल्ली के एम्स में भर्ती किया गया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में तय प्रक्रिया के तहत उनका इलाज धीरे-धीरे बंद किया गया।

यह मामला भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक बड़ा कानूनी और नैतिक उदाहरण बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ऐसे मामलों में जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा खींचने के बजाय व्यक्ति की गरिमा और पीड़ा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

हरीश राणा का निधन न सिर्फ उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे देश में ‘राइट टू डाई’ को लेकर चल रही बहस के लिए भी एक अहम मोड़ माना जा रहा है।