नई दिल्ली: देश में नक्सलवाद (Naxalism) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान (campaign) का बड़ा असर देखने को मिला है। पिछले एक दशक (decade) में 10,000 से अधिक माओवादी (Maoists) हथियार (arms) छोड़कर मुख्यधारा (mainstream) में लौट चुके हैं। अधिकारियों के मुताबिक, सरकार की सख्त सुरक्षा नीति और पुनर्वास (rehabilitation) योजनाओं ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और विकास कार्यों के विस्तार के कारण माओवादियों की गतिविधियां कमजोर पड़ी हैं। इसके चलते बड़ी संख्या में नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने का फैसला किया है।
बताया गया है कि साल 2025 में ही करीब 2300 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि 2026 के शुरुआती तीन महीनों में 630 से अधिक कैडर हथियार छोड़ चुके हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि नक्सल आंदोलन लगातार कमजोर हो रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि पहले जहां अलग-अलग रणनीतियां अपनाई जाती थीं, वहीं अब सरकार ने एकीकृत (unified) और बहु-आयामी (multi-dimensional) रणनीति लागू की है, जिससे बेहतर परिणाम सामने आए हैं।
केंद्र सरकार ने देश से नक्सलवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च तक का लक्ष्य तय किया है। सुरक्षा एजेंसियां लगातार ऑपरेशन चला रही हैं और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को पुनर्वास योजनाओं के जरिए मुख्यधारा में शामिल किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार हो रहे आत्मसमर्पण, शीर्ष नेतृत्व के खत्म होने और विकास कार्यों के विस्तार से आने वाले समय में नक्सलवाद पर और बड़ा असर देखने को मिल सकता है।