महिला आरक्षण बिल लोकसभा में 54 वोट से गिरा, मोदी सरकार पहली बार विधेयक पास कराने में विफल

लोकसभा में इस बिल पर करीब 21 घंटे तक चर्चा चली, जिसके बाद कुल 528 सांसदों ने मतदान किया।

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  • Updated On - April 18, 2026 / 02:29 AM IST

नई दिल्ली: महिला आरक्षण (women reservation bill) से जुड़ा संविधान का 131वां संशोधन बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। इस बिल में संसद की 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान था। लंबे समय तक चली चर्चा के बाद जब वोटिंग हुई, तो सरकार को जरूरी समर्थन नहीं मिल पाया और बिल 54 वोट से गिर गया। पहले पैराग्राफ में समझें कि यह एक संवैधानिक संशोधन (constitutional amendment) था, जिसके लिए विशेष बहुमत (special majority) यानी दो तिहाई वोट जरूरी थे।

लोकसभा में इस बिल पर करीब 21 घंटे तक चर्चा चली, जिसके बाद कुल 528 सांसदों ने मतदान किया। इनमें से 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में वोट दिया, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। हालांकि, इस बिल को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत यानी 352 वोट की जरूरत थी, जो सरकार जुटा नहीं पाई और बिल गिर गया।

सरकार ने इस दौरान दो अन्य महत्वपूर्ण बिलों को वोटिंग के लिए पेश ही नहीं किया। इनमें परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026 शामिल हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि ये दोनों बिल पहले से ही मुख्य बिल से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग से वोटिंग की जरूरत नहीं है।

पिछले 12 साल के शासनकाल में यह पहला मौका है, जब मोदी सरकार लोकसभा में कोई बिल पास कराने में असफल रही है। इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में अपने एक घंटे के भाषण में कहा था कि अगर ये बिल पास नहीं होता है तो इसकी जिम्मेदारी विपक्ष पर होगी।

लोकसभा में एनडीए के पास कुल 293 सांसद हैं, जबकि बिल पास कराने के लिए 352 वोट जरूरी थे। भाजपा केवल 5 अतिरिक्त सांसदों को ही अपने पक्ष में ला सकी, लेकिन बाकी विपक्षी दलों को साथ लाने में असफल रही, जिसके चलते बिल पास नहीं हो पाया।

इस बिल के गिरने के बावजूद 2023 में पारित और 16 अप्रैल 2026 को नोटिफाई किया गया महिला आरक्षण कानून लागू रहेगा। हालांकि, महिलाओं को इसका वास्तविक लाभ 2034 के लोकसभा चुनाव से मिलने की संभावना है। इसके लिए 2027 में होने वाली जनगणना के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होगा।

राजनीतिक तौर पर इस मुद्दे का असर आगामी चुनावों में देखने को मिल सकता है। भाजपा विपक्षी दलों को महिला विरोधी बताते हुए इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना सकती है। खासकर तमिलनाडु में एमके स्टालिन और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को इस मुद्दे पर घेरा जा सकता है।

अब सरकार के सामने आगे के विकल्प भी खुले हैं। सरकार इस बिल में बदलाव कर सकती है, जैसे दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़ाने का प्रावधान जोड़ना। इसके अलावा 2011 की बजाय 2027 की जनगणना को आधार बनाकर नया बिल पेश किया जा सकता है। साथ ही विपक्ष के सुझावों को शामिल कर व्यापक सहमति बनाने की कोशिश भी की जा सकती है।