32 साल बाद बस्तर पहुंचे MP के DGP कैलाश मकवाना हुए भावुक, बोले- याद आ गए लाल आतंक के दिन
By : hashtagu, Last Updated : May 21, 2026 | 6:35 pm
जगदलपुर: मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) कैलाश मकवाना ने बस्तर और दंतेवाड़ा में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए भावुक पोस्ट साझा किया है। भारत के नक्सलमुक्त (Naxal Free) होने की घोषणा के बीच उन्होंने साल 1994 से 1996 के दौरान बस्तर और दंतेवाड़ा में बतौर एसपी (SP) अपनी तैनाती की यादें ताजा कीं। उन्होंने कहा कि इतने वर्षों बाद जब फिर से बस्तर पहुंचे तो पुरानी यादें सामने आ गईं।
कैलाश मकवाना ने सोशल मीडिया पर लिखा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मध्य प्रदेश पुलिस की टीम को “पहला नक्सल मुक्त राज्य” बनने की दिशा में किए गए कार्यों के लिए सम्मानित किया। उन्होंने इस मौके पर शहीद पुलिसकर्मियों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवानों को श्रद्धांजलि भी दी। मकवाना ने बताया कि उन्होंने जगदलपुर में आयोजित केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद की बैठक और नक्सल प्रभावित राज्यों के डीजीपी सम्मेलन में हिस्सा लिया।
डीजीपी मकवाना 1988 बैच के IPS अधिकारी हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि 1994 से 1996 तक वे दंतेवाड़ा और बस्तर जिले के एसपी रहे थे। उस समय छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं था और यह अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। उस दौर में बस्तर और दंतेवाड़ा देश के सबसे संवेदनशील नक्सल प्रभावित इलाकों में गिने जाते थे।
गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में जगदलपुर में आयोजित बैठक में कहा था कि केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 से पहले देश से नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है। उन्होंने कहा कि कभी नक्सलवाद का सबसे बड़ा गढ़ माने जाने वाले बस्तर में अब शांति लौट चुकी है। सरकार अब उन इलाकों में विकास और सरकारी सेवाओं को सीधे आदिवासी समुदायों तक पहुंचाने पर काम कर रही है।
मध्य प्रदेश पुलिस भी लंबे समय से नक्सल विरोधी अभियानों में सक्रिय रही है। कुछ महीने पहले कैलाश मकवाना ने कहा था कि राज्य में नक्सलवाद अब खत्म होने की कगार पर है और पुलिस लगातार अभियान चला रही है। उन्होंने बताया था कि बालाघाट जैसे सीमावर्ती इलाकों में भी नक्सल गतिविधियां काफी कम हो चुकी हैं।
बस्तर से जुड़ी अपनी पुरानी यादों को साझा करते हुए मकवाना का यह पोस्ट अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कई पुलिस अधिकारियों और लोगों ने इसे नक्सलवाद के खिलाफ लंबे संघर्ष और सुरक्षा बलों के बलिदान से जोड़कर देखा है।




