बंदूक छोड़ लोकतंत्र की दहलीज पर: सुकमा के 78 सरेंडर नक्सलियों ने विधानसभा का नजदीकी अनुभव लिया

कल तक जो लोग जंगल की खाक छानते थे और जिनके कंधों पर बंदूकें बोझ बनी हुई थीं, आज उन्हीं कदमों ने लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों को छुआ।

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  • Publish Date - March 13, 2026 / 05:51 PM IST

रायपुर, छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के 78 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने शुक्रवार को रायपुर में छत्तीसगढ़ विधानसभा (Chhattisgarh Vidhan Sabha) की कार्यवाही को करीब से देखा। यह शैक्षणिक भ्रमण राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत कराया गया, ताकि पूर्व नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़कर समाज में शामिल किया जा सके।

कल तक जो लोग जंगल की खाक छानते थे और जिनके कंधों पर बंदूकें बोझ बनी हुई थीं, आज उन्हीं कदमों ने लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों को छुआ। सदन की कार्यवाही देखने के दौरान उन्होंने जाना कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कैसे कानून बनाकर प्रदेश और उनके क्षेत्र के विकास का मार्ग तय करते हैं।

इस दौरान 78 सरेंडर नक्सलियों ने वरिष्ठ मंत्री केदार कश्यप से मुलाकात की। सुकमा के विधायक और पूर्व मंत्री कवासी लखमा ने भी इन लोगों का स्वागत किया और उन्हें मुख्यधारा में लौटने के लिए शुभकामनाएं दीं।

सरकार का कहना है कि पुनर्वास नीति का उद्देश्य केवल हथियार जमा करवाना नहीं है, बल्कि पूर्व नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा का हिस्सा महसूस कराना भी है। पिछले डेढ़ साल में 2,500 से अधिक नक्सलियों ने सरेंडर किया है। सरकार उन्हें रहने, खाने और रोजगार की सुविधाएं दे रही है और यह सुनिश्चित कर रही है कि वे लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था को समझ सकें।

सुकमा से आए सरेंडर नक्सलियों ने कहा कि विधानसभा को करीब से देखना उनके लिए आंखें खोलने वाला अनुभव रहा। जंगल में रहते हुए जो बातें उन्हें लोकतंत्र के बारे में बताई गई थीं, हकीकत उससे कोसों दूर थी। अब ये लोग सरकार की योजनाओं का लाभ लेकर सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीना चाहते हैं। इस दौरे ने यह स्पष्ट किया कि गोलियों की गूँज से ज़्यादा ताकत बातचीत और संवैधानिक व्यवस्था में है।